कि तुम अपनी ज़िंदगी खुद जी रहे हो…
अपने फैसले खुद ले रहे हो…
लेकिन सच… इससे बिल्कुल अलग है…”
(2 सेकंड pause)
“तुम्हारी सोच… तुम्हारी नहीं है।”
“जब तुम पैदा हुए थे…
तुम्हारे पास कोई धर्म नहीं था…
कोई सोच नहीं थी…
कोई डर नहीं था…”
“फिर धीरे-धीरे…
तुम्हें सिखाया गया—
क्या सही है… क्या गलत है…
किससे प्यार करना है… किससे नफरत…”
“तुम्हें बताया गया—
‘ऐसा बनो’
‘वैसा मत बनो’
‘लोग क्या कहेंगे’…”
(थोड़ा intense tone)
“और धीरे-धीरे…
तुम वो बन गए…
जो तुम कभी थे ही नहीं…”
“तुमने कभी खुद से पूछा है…
कि जो तुम सोचते हो…
वो सच में तुम्हारी सोच है… या किसी और की दी हुई?”
“तुम Instagram scroll करते हो…
और तुम्हें लगता है—
तुम अपनी पसंद से देख रहे हो…”
“लेकिन असल में…
तुम्हें वही दिखाया जा रहा है…
जो तुम्हें कमजोर बनाता है…”
(थोड़ा गहरा, धीमा)
“तुम्हारी सोच…
एक battlefield है…”
“जहाँ तुम लड़ नहीं रहे…
बल्कि तुम्हें इस्तेमाल किया जा रहा है…”
ये जो साये साथ चलते हैं, सब धुंध है। सच तो सिर्फ इस दर्द में है जो ठहर गया है। तुम लाख कोशिश कर लो, ये खामोशी अब नहीं टूटेगी। क्योंकि जब रूह ही बिखर जाए, तो जीने की उम्मीद भी बस एक फरेब लगती है।