जब यमराज को अपना ही फैसला बदलना पड़ा
"क्या आपने कभी सोचा है... अगर एक दिन यमराज से भी कोई ऐसी गलती हो जाए, जिसे सुधारने के लिए पूरे ब्रह्मांड को रोकना पड़े... तो क्या होगा?"
यमलोक...
जहाँ समय कभी नहीं रुकता।
जहाँ हर पल अनगिनत आत्माएँ पहुँचती हैं।
जहाँ चित्रगुप्त का एक भी लेख कभी गलत नहीं होता।
और जहाँ यमराज का निर्णय... अंतिम निर्णय माना जाता है।
लेकिन...
एक दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने पहली बार यमलोक की नींव तक हिला दी।
दो यमदूत एक आत्मा को लेकर यमसभा में पहुँचे।
चित्रगुप्त ने अपना दिव्य ग्रंथ खोला।
पहला पृष्ठ...
दूसरा...
तीसरा...
फिर पूरा ग्रंथ...
लेकिन उस आत्मा का नाम कहीं नहीं था।
चित्रगुप्त के चेहरे पर पहली बार चिंता दिखाई दी।
उन्होंने दूसरा दिव्य ग्रंथ खोला।
फिर तीसरा।
फिर वह ग्रंथ, जिसमें सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव का लेखा सुरक्षित था।
फिर भी...
कुछ नहीं।
पूरा यमलोक स्तब्ध रह गया।
यमराज ने गंभीर स्वर में पूछा—
"चित्रगुप्त... क्या किसी आत्मा का लेख कभी छूट सकता है?"
चित्रगुप्त ने सिर झुकाकर उत्तर दिया—
"महाराज... जब तक ब्रह्मांड है... ऐसा कभी नहीं हुआ।"
यमराज धीरे-धीरे अपने सिंहासन से उठे।
उन्होंने उस आत्मा की ओर देखा।
आत्मा शांत खड़ी थी...
मानो उसे सब कुछ पहले से पता हो।
यमराज ने अपनी दिव्य दृष्टि खोली।
और अगले ही क्षण...
उनके हाथ से गदा छूटकर भूमि पर गिर गई।
यमलोक में पहली बार...
यमराज भयभीत दिखाई दिए।
उन्होंने ऊँचे स्वर में आदेश दिया—
"इस आत्मा को अभी... इसी क्षण... मेरे सामने से हटाओ!"
यमदूत भी घबरा गए।
उन्होंने पूछा—
"महाराज... इसका अपराध क्या है?"
यमराज ने धीरे से कहा—
"अपराध इसका नहीं है..."
"...अपराध उस शक्ति का है, जिसने इसे समय से पहले मेरे लोक में पहुँचा दिया।"
पूरा यमलोक काँप उठा।
उसी क्षण स्वर्गलोक में शंखनाद हुआ।
कैलाश पर समाधि में बैठे भगवान शिव ने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं।
और क्षीरसागर में भगवान विष्णु ने भी अपनी दृष्टि पृथ्वी की ओर कर दी।
मानो...
तीनों लोकों में कोई ऐसी घटना घट चुकी थी...
जिसे होने की अनुमति स्वयं नियति ने भी नहीं दी थी।
लेकिन सबसे बड़ा रहस्य अभी बाकी था।
वह आत्मा मुस्कुराई...
और बोली—
"यमराज... मैं मरकर यहाँ नहीं आया हूँ..."
"...मुझे किसी ने भेजा है।"
इतना सुनते ही...
यमराज के चेहरे का रंग बदल गया।
उन्होंने धीमे स्वर में केवल एक नाम लिया...
और वह नाम सुनकर चित्रगुप्त के हाथ से दिव्य ग्रंथ नीचे गिर पड़ा।
आख़िर वह नाम क्या था?
किसने एक जीवित आत्मा को यमलोक भेज दिया?
और क्यों पहली बार यमराज को अपना निर्णय बदलना पड़ा?
इस रहस्य का उत्तर अगले भाग में मिलेगा...
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धन्यवाद। हर हर महादेव! 🚩
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