दृश्य (Scene):
शहर के एगो छोटे से कमरा में अमित हाथ में एगो पुरान फोटो लेके बईठल बा। खिड़की के बाहर गाड़ी के शोर सुनाई देता। (Amit is sitting in a small city room holding an old photo. Traffic noise is heard outside.)
अमित: (फोटो देखत, लंबी सांस लेके)
"अजीब बा न... जब गाँव में रही जा, त मन करेला कि कब ई देहात छूटल अउर कब शहर जाईं। अउर आज जब शहर में बानी, त ई ऊँची-ऊँची इमारतें अउर भीड़ देख के दम घुटेला।
(खिड़की के ओर देखत)
ओहिजा, एतने घरी... बाबूजी खेत से घर आवत होइहें। माई चूल्हा फूँकत होई, अउर पूरा घर सोंधी-सोंधी खुशबू से भर गइल होई। इहाँ त हवा में भी सिर्फ धुँआ बा।
(थोरड़ा मुस्कुरा के)
याद बा... जब हम छोट रहनी, त बरखा के पानी में नाव चलावे खातिर केतना झगड़ा करत रही जा। आ आज? आज त बरखा के मतलब सिर्फ ऑफिस पहुँचे में देरी बा। पैसा त कमा लिहलनी, बाकिर ऊ सुकून कहाँ गइल?
(खड़ा होके, खुद से बात करत)
ना! अइसे हार मानल ठीक नईखे। ई शहर हमके बहुत कुछ देले बा, त कुछ छीन भी लिहले बा। बाकिर एगो वादा बा माटी से... एक दिन वापस जरूर आईब। अउर ओही नीम के पेड़ के नीचे बईठ के फिर से खुल के सांस लेब।
(मुस्कुरा के फोटो मेज पर रख देला)
अभी त बस मेहनत करे के बा। नाम रौशन करे के बा।"
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