एक बार सर्दियों की ठंडी रात में,
एक छोटा सा दीपक मंदिर के बाहर जल रहा था।
तेज हवा चल रही थी, और दीपक किसी भी वक्त बुझ सकता था।
तभी एक कांपता हुआ साँप वहाँ आया।
ठंड से उसका शरीर अकड़ चुका था।
वह बोला,
“दीपक भाई… तुम्हारी लौ से थोड़ा ताप मिल जाए तो मैं बच जाऊँगा।
कसम से, मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”
दीपक दुविधा में पड़ गया।
आखिर वो रोशनी देने के लिए ही तो जल रहा था।
उसने कहा,
“आ जा भाई, थोड़ा पास आ जा… मेरी गर्मी बाँट ले। जिंदगी बचाना सबसे बड़ा धर्म है।”
साँप धीरे-धीरे दीपक के पास आया।
जैसे ही उसके शरीर में गर्माहट आई…
साँप ने अपनी जीभ चलाई, आँखें चमकाईं…
और धप्प!
एक झटके में उसने दीपक की लौ पर वार कर दिया।
लौ तड़पकर बुझ गई।
अंधेरा छा गया।
बुझते हुए दीपक ने आखिरी बार पूछा,
“मैंने तो तुझे बचाया था… फिर तूने मुझे ही क्यों मार दिया?”
साँप फुसफुसाया,
“क्या करूँ?... ज़हर मेरी फितरत है। दूसरों की अच्छाई मेरी आदत नहीं बदल सकती।”
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✨ Moral:
दुनिया में कुछ लोग ऐसे मिलेंगे,
जिन्हें आप जितनी भी भलाई दे दो,
वे अपनी फितरत नहीं बदलेंगे।
इसलिए भलाई करो—but with wisdom,
क्योंकि हर किसी को दिल खोलकर अपनाना समझदारी नहीं होती।
एक बार एक चूहा और शेर दोस्त बन गए। शेर को अपनी ताकत का बहुत घमंड था। एक दिन जंगल में आग लग गई, तब छोटे चूहे ने ही शेर को बचाया। इससे सीख मिली कि किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए।